Class 10 Biology Chapter 1 Notes in Hindi | जैव प्रक्रम (Life Process) Best Notes in Hindi 

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दोस्तों यह पोस्ट बहुत ही महत्वपूर्ण है | Class 10 Biology Chapter 1 Notes in Hindi | इस Chapter का नाम जैव प्रक्रम (Life Process) है | दोस्तों हमने इस पोस्ट में Biology Chapter 1  का एक Short Notes बनाया है जो दसवीं कक्षा के विद्यार्थी के लिए बहुत ही उपयोगी है |दोस्तों इस पोस्ट में “जैव प्रक्रम” से जुड़े लगभग हर एक Point परिभाषित किया गया है जिसे कम समय में पढ़कर अच्छे से तैयारी कर सकते हैं और परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो सकते हैं |  आप Class 10 Biology Chapter 1 pdf Notes  भी डाउनलोड कर सकते हैं | Class 10 Biology Chapter 1 Notes in Hindi |

Table of Contents

Class 10 Biology Chapter 1 Notes in Hindi |

सजीव :- 

जीवित वस्तुओं को सजीव कहते हैं, सभी पौधे और जंतु सजीव वस्तुएं हैं | 

सजीवों के लक्षण :-  गति, प्रचलन, पोषण, वृद्धि, श्वसन, उत्सर्जन, प्रजनन, मृत्यु आदि सजीवों के प्रमुख लक्षण है | 

निर्जीव :- 

जिन वस्तुओं में उपरोक्त लोड नहीं पाए जाते हैं, उन्हें निर्जीव कहते हैं | 

जैव प्रक्रम :- 

जीव धारियों में जीवित रहने के लिए होने वाले समस्त क्रियाओं को सामूहिक रूप से “ जैव प्रक्रम” कहा जाता है |

वे सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से अनुरक्षण का कार्य करते हैं, उसे “ जैव प्रक्रम” कहते हैं |  

जैसे :-  पोषण, पाचन, श्वसन, वहन, उत्सर्जन, प्रचलन, नियंत्रण एवं समन्वयन इत्यादि | 

जीवन के अनुरक्षण के लिए आवश्यक प्रक्रम :- 

  1.  पोषण
  2.  श्वसन 
  3.  परिवहन
  4.  वृद्धि
  5.  उत्सर्जन

पोषण :- 

जीव शरीर को वृद्धि एवं विकास के लिए विभिन्न पोशाको ,जैसे :- कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन एवं खनिजों की आवश्यकता होती है |इन्हें सम्मिलित रूप से भोजन कहते हैं |  भोजन को अंत ग्रहण करने की प्रक्रिया पोषण कहलाती है | 

पोषण की आवश्यकता :-  शरीर मैं क्रम की स्थिति के अनुरक्षण तथा ऊर्जा प्राप्ति के लिए होते हैं | 

सजीव अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं ?

सभी जीवधारी अपना भोजन समान प्रकार से प्राप्त नहीं करते हैं। अर्थात इनमें भोजन प्राप्त करने की विभिन्न विधियां पाई जाती हैं।  भोजन प्राप्त करने की विधि के आधार पर जो धारियों को दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है। 

(1) स्वपोषी :- ये जीव अकार्बनिक  स्रोतों से कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल ग्रहण करके कार्बनिक खाद बनाते हैं |  जैसे :-  सभी हरी पौधे और कुछ जीवाणु | 

(2)विषमपोषी :- ये जीव जटिल कार्बनिक पदार्थों को ग्रहण करते हैं |  जिनके विघटन के लिए जैव उत्प्रेरकों ( एंजाइमों ) की आवश्यकता होती है |  जैसे:-  जंतु एवं कारक |

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स्वपोषी पोषण :- 

यह पोषण की वह विधि है | जिसमें जीवधारी सरल और अकार्बनिक पदार्थों से जटिल कार्बनिक पदार्थों का निर्माण स्वयं करते हैं | सभी हरे पौधे तथा कुछ जीवाणु इसी विधि से पोषण प्राप्त करते हैं | इनमें कार्बन तथा ऊर्जा की आवश्यकताएं प्रकाश संश्लेषण द्वारा पूरी होती हैं |  

प्रकाश संश्लेषण :- 

इस प्रक्रिया में हरे पौधे पर्णहरित की सहायता से सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में मृदा से जल तथा वायु से Co2 ग्रहण करके शर्करा ( कार्बोहाइड्रेट ) का निर्माण करते हैं | साथ ही ऑक्सीजन उत्पादन के रूप में मुक्त करते हैं | 

6Co2+12H2oसूर्य का प्रकाश पर्णहरितC6H12O6+6H2O

प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण होती हैं :- 

  1. क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा को अवशोषित करना 
  2. प्रकाश ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में रूपांतरित करना तथा जल अणुओं को हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन में अपघटन 
  3. कार्बन डाइऑक्साइड का कार्बोहाइड्रेट में अपचयन

रंध्र :- 

पौधों के हरे भागों की बाह्य त्वचा में असंख्य सूक्ष्म छिद्र उपस्थित होते हैं |  जिन्हें रंध्र कहा जाता है | 

प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के लिए गैसों का अधिकांश आदान-प्रदान इन्हें रंध्रों के द्वारा होता है |  इसके अलावा रंध्र पौधों के हरे भागों से जल के अतिरिक्त मात्रा को जल वाष्प के रूप में बाहर निकालने का भी कार्य करते हैं |  इस क्रिया को “वाष्पोत्सर्जन” कहते हैं | 

        वाष्पोत्सर्जन तथा गैसों का आदान-प्रदान रंध्रों के खुलने एवं बंद होने पर निर्भर करता है | यदि रंध्र बंद होते हैं तो वाष्पोत्सर्जन एवं गैस विनिमय रुक जाता है | 

विषमपोषी पोषण :- 

पोषण की विधि जिसमें जीव विभिन्न रितियों से पोषण प्राप्त करते हैं | विषमपोषी पोषण कहलाता है |

भोजन के स्वरूप, भोजन की उपलब्धता तथा इसे ग्रहण करने के ढंग के आधार पर विषमपोषी पोषण विधियां विभिन्न प्रकार की हो सकती हैं | 

शाकाहारी :- गाय, हिरण आदि सीधे ही घास एवं वनस्पतियों को खाते हैं | उन्हें शाकाहारी कहते हैं | 

मांसाहारी :-   शेर, बाघ आदि इन शाकाहारी प्राणियों को खाते हैं  उन्हें मांसाहारी कहते हैं। 

सर्वाहारी :- बिल्ली, कुत्ता, मनुष्य आदि वनस्पति उत्पादों तथा जंतु या इनके उत्पादों को खाते हैं।  सर्वाहारी कहलाते हैं | 

परजीवी :-  कुछ जीव ऐसे होते हैं | जो अपने पोषण को बिना मारे अपना पोषण प्राप्त करते हैं परजीवी कहलाते हैं | जैसे :-  जूँ ,लीच ,फिता क्रीम, अमरबेल 

जीव अपना पोषण कैसे करते हैं :-  

अमीबा में पोषण :- 

अमीबा एक कोशिकीय प्राणी है |  जो अपनी कोशिकीय सतह पर बनाए गए अंगुली समान और अस्थाई प्रवर्धों द्वारा भोजन कणों को पकड़ता है | ये प्रवर्धों भोजन कण को चारों ओर से घेर लेते हैं | और संगलीत होकर खाद्य रिक्तिका बनाते हैं |इसमें भोजन कणों का पाचन होता है | तथा अपशिष्ट पदार्थ पुनः बाहर निकाल दिए जाते हैं | 

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पैरामीशियम में पोषण :- 

पैरामीशियम भी एक कोशिकीय प्राणी है | किंतु इसकी कोशिका का आकार निश्चित होता है और एक विशिष्ट स्थान से भोजन ग्रहण करता है | इसकी सतह पर उपस्थित पक्ष्माभ भोजन कणों को मुख्य खाद्य तक लाने में सहायता करते हैं | 

एक कोशिका जीवों का नाम =  अमीबा, पैरामीशियम 

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मनुष्य में पोषण :- 

मानव पाचन तंत्र :- 

भोजन के अंत ग्रहण से लेकर मल त्याग तक एक तंत्र जिसमें अनेकों अंग, ग्रंथियां आदि सम्मिलित है |  सामंजस्य के साथ कार्य करते हैं | यह पाचन तंत्र कहलाता है | 

पाचन तंत्र निम्न दो रचनाओं से मिलकर बना होता है :- 

  1. आहार नाल
  2. पाचन ग्रंथियां

आहार नाल :-  मनुष्य की आहार नाल लंबी कुंडलीत  एवं पेशीय संरचना है | जो मुंह से लेकर  गुर्दा तक फैली रहती हैं |मनुष्य में आहार नाल लगभग 8 से 10 मीटर लंबी होती हैं |  आहार नाल के प्रमुख अंग निम्नलिखित हैं |  

  • मुख
  • ग्रसनी
  • ग्रास नली
  • आमाशय 
  • छोटी आंत
  • बड़ी आंत

मुख :-  मुख्य दो गतिशील पेशीय होठों के द्वारा घिरा होता है,जिन्हें ऊपरी होंठ व निचली होंठ कहते है | मुख मुख गुहा में खुलता है भोजन को हाथों द्वारा निवाले के रूप में मुख में रखा जाता है | 

ग्रसनी :-  ग्रासनी में किसी प्रकार का पाचन नहीं होता है।  यह भोजन को ग्रसिका में भेजने का कार्य करते हैं। 

ग्रास नली :-  ग्रासनी को आमाशय से जोड़ने का कार्य करती है और अंत में आमाशय में खुलती हैं।   

आमाशय:- आमाशय भोजन को पचाने का कार्य करते हैं। 

छोटी आंत :-  इस भाग में भोजन का सर्वाधिक पाचन एवं अवशोषण होता है | 

बड़ी आंत :- इसका मुख्य कार्य जल, खनिज लवणों का अवशोषण तथा  अपचित भोजन कोमल द्वार से उत्सर्जित करता है | 

हमारे आमाशय में अम्ल की भूमिका :- 

हमारे आमाशय में उपस्थित जठर ग्रंथियों द्वारा HCL स्रावित होता है |यह अमाशय में अम्लीय माध्यम बनाता है | HCL  भोजन के साथ आए जीवाणुओं को नष्ट करके भोजन को सड़ने से बचाता है | 

पाचन एंजाइमों के कार्य :- 

 एंजाइम कार्बनिक जैव उत्प्रेरक है | जो विभिन्न जैव रासायनिक क्रियाओं की दर बढ़ा देते हैं | ये  पाचन क्रिया में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा के पाचन को सुगम बनाते हैं |  मुख गुहा में एमीलेस नामक एंजाइम कार्बोहाइड्रेट का आंशिक पाचन करके इससे माल्टोज में बदलता है | उदर में लाइपेज नामक एंजाइम वसा को वसीय अम्ल एवं गिल्स रोल में बदलता है | 

यकृत के कार्य :-

  • यकृत पित्त रस का श्रावण करता है जो आमाशय से आए भोजन को क्षारीय बनाता है |  
  • यकृत वसा एवं विटामिंस का संचय  करता है | 
  • यकृत वसा की इमल्सी करण में सहायक होता है | जो भोजन को सड़ने से रोकता है | 

श्वसन :- 

कार्बनिक भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण द्वारा विघटन शोषण कहलाता है। इस क्रिया में ऊर्जा उत्पन्न होती हैं | 

श्वसन के प्रकार :- 

(1) वायवीय श्वसन :- ऑक्सीजन की उपस्थिति में होने वाले श्वसन को वायवीय श्वसन कहते हैं | वायवीय श्वसन अधिकांश प्राणियों एवं पादप द्वारा संपन्न किया जाता है | इस प्रक्रिया में ग्लूकोज का पूर्ण होकर Co2 जल तथा मोचित ऊर्जा (ATP) का निर्माण होता है | वायवीय श्वसन में ऊर्जा का मोचन अत्यधिक होता है | 

ग्लूकोज कोशिका द्रव्य में ग्लाइकोलाइसिसपाइरूवेटमाइक्रो कंडिया में ऑक्सीजन6Co2 +6H2O +38 ATP

ATP = एडिनोसिन ट्राई फास्फेटADP= एडिनोसिन ड्राई फास्फेट

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(2) अवायवीय श्वसन :- ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होने वाले श्वसन को अवायवीय श्वसन कहते हैं | 

इसके द्वारा भोज्य पदार्थों का अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है | और इसमें अपेक्षाकृत कम ऊर्जा उत्पन्न होते हैं | 

अवायवीय श्वसन जो सूक्ष्मजीवियोँ जैसे :- “यीस्ट” में होता है | 

ग्लूकोज ग्लाइकोलाइसिस  कोशिका द्रव्य मेंपाइरूवेट ऑक्सीजन की  अनुपस्थिति2C2 H5OH +2Co2 +2 ATP

ATP :- 

इसका पूरा नाम एडिनोसिन ट्राई फास्फेट है | अधिकांश कोशिकीय प्रक्रमों के लिए ATP ऊर्जा मुद्रा है | श्वसन क्रिया में विमोचन ऊर्जा का उपयोग ADP  तथा कार्बनिक फास्फेट ATP अणु बनाने में किया जाता है | 

ADP + (P) ऊर्जा ADP – (P) = ATP 

इन ATP का प्रयोग शरीर की विभिन्न क्रियाओं में किया जाता है | ATP  के एक उच्च ऊर्जा बंद के खंडित होने से 30.5 Kj/mol  के तुल्य ऊर्जा मुक्त होती हैं | 

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पौधों में श्वसन क्रिया :-

पौधों में ऑक्सी तथा अनाक्सी दोनों प्रकार का श्वसन पाया जाता है |ऑक्सी श्वसन वायु की उपस्थिति में होता है | इसमें रंध्रों द्वारा ऑक्सीजन युक्त उप रंध्रीय गुहा में प्रवेश करती हैं | तथा Co2 युक्त वायु बाहर निकलती हैं |  यह प्रक्रिया पौधों में लगातार होती हैं |  जिसमें गैसीय विनिमय दो चरणों में होता है | (1) स्वशनी कोशिकाओं तथा अंतः कोशिकीय वायु के बीच गैसों का विनिमय (2)वातावरणीय वायु तथा अन्तः कोशिकीय की वायु में विनिमय 

जंतुओं में श्वसन :- 

जंतुओं में पर्यावरण से ऑक्सीजन लेने और उत्पादित Co2  को बाहर निकालने के लिए भिन्न प्रकार के अंगों का विकास हुआ | स्थलीय प्राणी वायु से ऑक्सीजन लेते हैं |परंतु जलीय जीव जल में विलय ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं | भिन्न-भिन्न प्राणियों में श्वसन के भिन्न-भिन्न तरीके पाए जाते हैं |

  • सरल एक कोशिकीय प्राणी जैसे अमीबा में श्वसन कोशिका कला द्वारा गैसों के साधारण विशरण द्वारा होता है | 
  •  कुछ प्राणी जैसे केंचुआ अपनी त्वचा द्वारा गैसों का विनिमय करते हैं | 
  • जलीय जंतु जैसे मछली अपने मुंह द्वारा जल लेती है | तथा बलपूर्वक इससे क्लोमो तक पहुंचाती है | जहां विलेय ऑक्सीजन रुधिर में विसरीत हो जाती हैं | 
  • कीटों में गैसों के आदान-प्रदान के लिए श्वास रंध्र तथा श्वास नली पाए जाते हैं | 
  • स्थलीय प्राणियों,  जैसे पक्षी, कुत्ता, मनुष्य आदि में श्वसन के लिए फेफड़े पाए जाते हैं | 

मनुष्य में श्वसन :- 

 मनुष्य में श्वसन के लिए एक जटिल प्रकार का शासन तंत्र पाया जाता है | 

मनुष्य का श्वसन तंत्र :- 

 मनुष्य में श्वसन फेफड़े द्वारा होता है | मनुष्य के श्वसन को फुफ्फुसीय श्वसन कहते हैं | मनुष्य के श्वसन तंत्र को दो भागों में बांटा जा सकता है। 

( 1) श्वसन मार्ग :-  श्वसन मार्ग से होकर वायु फेफड़ों में प्रवेश करती हैं तथा बाहर जाती हैं | सांस लेने तथा निकालने की क्रिया स्वक्षो वाश कहलाती है | 

  • स्वशनी :- वक्ष गुहा में प्रवेश करने के पश्चात वायु नाल दो श्वसनीय में विभाजित हो जाते हैं | प्रत्येक स्वसनी अपनी और के फेफड़ों में प्रवेश करते हैं | 

(2) फेफड़े :-  वक्ष गुहा में दो फेफड़े हृदय के पाशवों में स्थित होते हैं | प्रत्येक फेफड़ा गुलाबी, कोमल एवं स्पंजी रचना है |  प्रत्येक फेफड़ा प्लूरल कला से घिरा होता है |  फेफड़ों में महीन नलिकाओं का जाल फैला रहता है |  इस जाल को स्वशनी वृक्ष कहते हैं | 

मनुष्य में श्वासोछ्वास  :- 

(1) निश्वासन :- 

  • वायुमंडलीय वायु को खींचकर फेफड़ों में भरने की क्रिया नि श्वसन  कहलाती हैं | 
  • इसमें Co2 युक्त वायु फेफड़ों में प्रवेश करती हैं | 
  • इसमें फ्लूरल गुहावों का आयतन बढ़ जाता है | 

(2) उच्च श्वसन :- 

  •  फेफड़ों की वायु का बाहर निकाला जाना उच्च श्वसन कहलाता है | 
  • इसमें Co2 युक्त वायु फेफड़ों से बाहर निकलती हैं | 
  •  इसमें प्लूरल गुहा वो का आयतन कम हो जाता है | 

वहन :- 

मानव में वहन :- 

मानव शरीर में रुधिर वहन के लिए एक तरल माध्यम का कार्य करता है।  इसे तरल संयोजी उत्तक भी कहते हैं।  रुधिर के प्रमुख दो भाग होते हैं। 

  • तरल भाग प्लाजा :-  तरल भाग प्लाजा तथा इसमें निलंबित रुधिर कोशिकाएं प्लाजा रुधिर का  90% भाग बनाता है।  लाल रुधिर कोशिकाएं ऑक्सीजन का वाहन करती हैं। इस कार्य में लाल रुधिर कोशिकाओं में उपस्थित हीमोग्लोबिन वर्णक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।  हीमोग्लोबिन की उपस्थिति तथा लाल रुधिर कोशिकाओं की अधिकता के कारण रुधिर लाल रंग का होता है।  
  • हृदय :-  मनुष्य का हृदय वक्ष गुहा में बाई और स्थित होता है। इसका आकार बंद मुट्ठी के बराबर होता है। दो आलिंद तथा दो नीले इन्हें दाया आलिंद बाया आलिंद दाया निलय लेता तथा बायां निलय  में विभेदित कर सकते हैं। अलिंद ऊपर की ओर तथा निलय नीचे की ओर होता है।

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परिसंचरण तंत्र :- 

मानव के शरीर में उपस्थित ऐसा तंत्र जो पोषक तत्वों , गैसों ,हार्मोन तथा अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करता है |  उसे परिसंचरण तंत्र  कहते हैं | 

 परिसंचरण तंत्र :- 

  •  रक्त
  •  ह्रदय
  •  रक्त वाहिकाएं 

 रक्त :- 

  • रक्त एक  प्रकार का तरल संयोजी उत्तक है | जो शरीर के विभिन्न भागों में पोषक तत्व हार्मोन तथा अपशिष्ट पदार्थों का परिवहन करता है उसे रक्त कहते हैं | . 
  • इसका ph 7.4  होता है | 
  •  इसका निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होता है | 
  •  नवजात शिशु में रक्त का निर्माण प्लीहा में होता है | 
  •  एक सामान्य व्यक्ति में 5 लीटर रक्त होता है | 

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रक्त :- 

प्लाज्मा(55%) (द्रव्य भाग ) :- 

जल (98%)

कार्बनिक और अकार्बनिक पदार्थ (8%) 

रुधिर कोशिकाएं (45%) ठोस भाग :- 

RBC

WBC

प्लेटलेट्स 

RBC ( लाल रक्त कोशिकाएं ),एरिथ्रोसाइट :-  

  • RBC में हीमोग्लोबिन नामक एक रंजक होता है  जिसके कारण RBC का रंग लाल होता है |   
  • RBC रुधिर कणिकाओं का 99% भाग होते हैं | 
  • RBC का निर्माण लाल अस्थि मज्जा में होती हैं | 
  • यह केंद्रक विहीन कोशिकाएं हैं |
  •  इसका जीवनकाल 120 दिन होता है | 
  •  यह ऑक्सीजन का परिवहन करती हैं | 

WBC ( श्वेत रुधिर कणिकाएं ) ल्यूकोसाइट :- 

  • इसमें केंद्रक पाया जाता है | 
  • इसमें हीमोग्लोबिन नहीं पाया जाता है यह रंगहीन होती हैं | 
  • WBC का निर्माण लाल अस्थि मजा में होता है | 
  • WBC  शरीर की रोगाणुओं से सुरक्षा करती है तथा यह प्रतिरक्षा प्रदान करती हैं | 

बिम्बाणु ( प्लेटलेट्स ), थ्रोम्बोसाइट :- 

  • यह केंद्रक विहीन कोशिकाएं होती हैं | 
  • इसका जीवनकाल 10 दिन होता है | 
  • यह रक्त का थक्का जमाने में मदद करती हैं | 

परिसंचरण तंत्र :- 

 मनुष्य मेंO2व Co2 पोषक पदार्थों, उत्सर्जी पदार्थों तथा स्त्रावी पदार्थों को शरीर के एक भाग से दूसरे भाग में पहुंचाने तथा लाने वाले तंत्र को ही रुधिर परिसंचरण तंत्र कहते हैं |

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खुला  परिसंचरण तंत्र :- 

इसमें रुधिर किसी प्रकार की वाहिनी में नहीं बहता है | रुधिर अंतरागो के आसपास पाया जाता है |  इसमें किसी प्रकार का दान उत्पन्न नहीं होता है |  

झिंगा कीट आदि जिलों में खुला परिसंचरण तंत्र पाया जाता है | 

बंद परिसंचरण तंत्र :- 

रुधिर, महीन, लचीली धमनियों एवं शिराओं में बहता है। रुधिर हृदय से विभिन्न अंगों को  पंप किया जाता है इसमें रुधिर दाब उत्पन्न होता है | मनुष्य में बंद परिसंचरण तंत्र पाया जाता है | 

नलिकाए  रुधिर वाहिकाए :- 

जनतंत्र शरीर में रुधिर के वितरण करने एवं एकत्र करने के लिए असंख्य नलिका में पाई जाती हैं |  जिन्हें रुधिर वाहिकाएं कहते हैं |ये तीन प्रकार की होती हैं | 

(1) धमनी :-    

  • यह मोटी और लचीली दीवार वाली नलीकाए हैं | 
  • ये शुद्ध रुधिर को हृदय से शरीर में विभिन्न अंगों में पहुंचाती हैं | 
  • इनमें वल्ल अनुपस्थित होता है | 
  • इसमें रुधिर का बहाव तीव्र गति के साथ होता है | 

(2) शिरा :- 

  • ये पतली और दृढ़ दीवार वाली संकरी नलिकाए हैं  | 
  •  इनमें वॉल उपस्थित होते हैं | 

(3) कोशिकाए  :- 

किसी अंग या ऊतक में पहुंचकर धमनी उत्तरोत्तर अत्यधिक पतली वाहिनीया बनाती हैं | उन्हें कोशिकाएं कहते हैं |  कोशिका एक मुट्ठी कोशिका होती है जिससे इन से होकर उसके में गैसों व अन्य पदार्थों का दिन में सरलता से हो सके | 

रक्तदाब :- 

रुधिर वाहिकाओं की भित्ति के विरुद्ध जो दाब उत्पन्न होता है उसे रक्तदाब कहते हैं | 

यह दाब शिराओं में कम तथा धमनियों में बहुत अधिक होता है |

रक्त दाब का सबसे पहला परीक्षण “स्टीफन हेल्स” ने घोड़े पर किया |  

रक्त दाब के प्रकार :- 

प्रकुंचन दाब :-  हृदय के संकुचन से उत्पन्न दाब के कारण धमनी में रक्त बहता है |  इसे प्रकुंचन दाब कहते हैं। सामान्य प्रकुंचन दाब लगभग 120 mm  पारा है | 

अनुशिथिलन दाब :-  हृदय में शीतलन के कारण धमनी में रक्त दाब कम हो जाता है | उसे अनुशिथिलन दाब कहते हैं | अनुशिथिलन दाब लगभग 80 एमएम पारा होता है | 

पादपों में परिवहन :- पौधे पर्यावरण से गैस के रूप में कार्बन डाइऑक्साइड जैसे पदार्थ लेते हैं |  फिर भी उन्हें नाइट्रोजन, फास्फोरस, लौह , कैल्शियम,  मैग्नीशियम, आदि अनेक पदार्थों की आवश्यकता विभिन्न प्रकार के खाद्य पदार्थों पोषक पदार्थों आदि के निर्माण के लिए होते हैं | ऐसे अनेक पदार्थ मृदा में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहते हैं | ये  पदार्थ पौधों की जड़ों द्वारा अवशोषित किए जाते हैं | पादप परिवहन तंत्र दो प्रकार के जटिल ऊतकों से मिलकर बना होता है |  

  • जाइलम :-  यह उत्तक तंत्र जड़ों द्वारा अवशोषित जल एवं खनिज लवणों को पौधे के विभिन्न भागों जैसे तन्ना, पतियों व पुष्पों में आधे पहुंचाता है | 
  • फ्लोएम :- यह उत्तक तंत्र पतियों में निर्मित खाद पदार्थ का स्थानांतरण पौधे के विभिन्न भागों एवं जड़ों में करता है | 

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जल का परिवहन :- 

मृदा से जल का अवशोषण मूल रोमो द्वारा होता है | मूल रोम तथा मृदा जल के बीच आयन सांद्रण में अंतर होने के कारण जल मूल रोमों में प्रवेश करता है | यह जटिल क्रमिक रूप से जड़ की कोशिकाओं में विपरीत होता हुआ जड़ के जाइलम उत्तक तक पहुंचता है |

भोजन तथा दूसरे पदार्थ का स्थानांतरण :- 

प्रकाश संश्लेषण की विलेय उत्पादों का वहन स्थानांतरण कहलाता है | और यह वजह फ्लोएम नामक उत्तक तंत्र द्वारा होता है | फ्लोएम इन उत्पादों के अलावा अमीनो अम्ल तथा अन्य पदार्थों का परिवहन भी करता है |भोजन तथा अन्य पदार्थों का स्थानांतरण उत्तक की सहायक कोशिकाओं की सहायता से चालनी नलिका की ऊपरी मुखी तथा अधोमुखी दोनों दिशाओं में होता है |

उत्सर्जन :- 

शरीर में होने वाली विभिन्न अपचायी क्रियाओं में उत्पन्न नाइट्रोजनी वर्ज्य  पदार्थों को बाहर निकाला जाना उत्सर्जन कहलाता है | 

मानव में उत्सर्जन :- 

उत्सर्जन अंगों को सामूहिक रूप से उत्सर्जन तंत्र कहा जाता है | 

 मनुष्य में निम्न उत्सर्जन अंग पाए जाते हैं | 

  1. वृक्क 
  2. मूत्र वाहिनियां
  3.  मूत्राशय 
  4.  मूत्र मार्ग 

वृक्क :-  मनुष्य में 1 जोड़ी वृक्क  पाए जाते हैं |  यह दोनों वृक्क उदर में कशेरुक दंड के दोनों ओर स्थित है | वृक्क  गहरे भूरे एवं सेम के बीज की आकृति के होते हैं |  इनका बाहरी भाग उभरा हुआ तथा भीतरी भाग दबा हुआ होता है |  जिन के मध्य में छोटा सा एक गड्ढा होता है |  गड्ढे को हाईलम  कहते हैं |  हाईलम भाग  से वृक्क धमनी प्रवेश करती हैं | और वृक्क  शिरा एवं मूत्र वाहिनी बाहर निकलते  | 

मूत्र वाहिनियां :- ये वृक्क से निकलकर मूत्राशय तक जाती हैं | इनकी भित्ति मोटी होती हैं तथा गुहा संकरी होती हैं |  इनकी भी भित्ति में क्रमाणु कुंजन पाया जाता है |  जिसके फलस्वरूप मूत्र आगे की ओर बढ़ता है | 

मूत्राशय :-  यह उदर  के पिछले भाग में स्थित होता है |मूत्राशय में मूत्र वाहिनियां आकर खुलती है | व इसमें मूत्र की संग्रहित किया जाता है |  इसलिए इससे मूत्र संचय आशय कहते हैं |

मूत्र मार्ग :-  मूत्राशय का पश्च छोर संकरा होकर एक पतली नलिका में परिवर्तित हो जाता है | जीसे मूत्रमार्ग कहते हैं | मूत्र के निष्कासन के क्रिया को मूत्रण कहा जाता है |      

वृक्काणु या नेफ्रॉन :- 

प्रत्येक वृक्क  मैं लगभग 10 लाख अति सूक्ष्म नलिकाएँ होती हैं | जिन्हें वृक्क नलिकाएँ हैं अथवा नेफ्रॉन कहते हैं | प्रत्येक नेफ्रॉन एक उत्सर्जन की इकाई होती हैं |  नेफ्रॉन का प्रारंभिक भाग एक प्याले के समान होता है | जिसे बोमन रामपुट के प्याले नुमा ढांचे में रक्त की नालियों का गुच्छा होता है |

जिसे ग्लौमेरुलर कहते हैं |  ग्लौमेरुलस एवं वुमन संपुट को मिलाकर मेल पिगी कोस कहते है | 

कृत्रिम वृक्क ( अपोहन ) :- 

उत्तरजीविता के लिए वृक्क जैव अंग है | कई कारक जैसे संक्रामक ,आघात या वृक्क मैं सीमित रुधिर प्रवाह, वृक्क  की क्रियाशीलता को कम कर देते हैं | यह शरीर में विषैले अपशिष्ट को सूचित करता है |  

जिसे मृत्यु भी हो सकती हैं |  एक कृत्रिम वृक्क नाइट्रोजन अपशिष्ट उत्पादों को रुधिर से अपोहन द्वारा निकालने की एक युक्ति है | 

पादपों में उत्सर्जन :- 

 पादपों के मुख्य उत्सर्जी उत्पाद O2तथा CO2 है | जिन्हें क्रमश श्वसन तथा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में प्रयुक्त या बाहर उत्सर्जित किया जाता है | पादपों के बहुत से उत्तक में मृत कोशिकाएं पाई जाती हैं |  कुछ अपशिष्ट उत्पादों जैसे :-  रेजिन, गोंद, आदि पुराने जाइलम में संचित रहते हैं | 

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